Burhanpur Banana Farmersप्राकृतिक आपदा के बाद अब मंडी और व्यापारियों की बेरुखी से बेबस हुए क्षेत्र के केला उत्पादक किसान
Burhanpur Banana Farmersमध्यप्रदेश का बुरहानपुर जिला अपनी मिठास और रिकॉर्ड केला उत्पादन के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है। समूचे प्रदेश में केले की सबसे ज्यादा पैदावार अकेले इसी जिले में होती है। हालांकि, इन दिनों यहाँ के केला उत्पादक किसान एक अजीब और गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। पिछली बार प्राकृतिक आपदा की मार झेल चुके किसानों को हालांकि सरकार से मुआवजा मिल गया था, लेकिन अब फसल तैयार होने के बावजूद खेतों से केला नहीं उठ पा रहा है। व्यापारियों द्वारा कटाई न किए जाने के कारण पौधों पर ही केले के लुंगर पककर सड़-गल रहे हैं, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
Burhanpur Banana Farmersखेतों में पक रहा केला, मंडी से गाड़ियों की आवक के दावों पर उठे सवाल
बुरहानपुर क्षेत्र के लोनी, बिरोदा, पातोंडा, भोलाना और शाहपुर तहसील के भावसा, चौंडी, मोहद सहित दर्जनों गांवों में केले की फसल पूरी तरह तैयार खड़ी है। किसानों का आरोप है कि केला नीलामी सभागृह से रोजाना 80 से 100 गाड़ियों की आवक दर्शाई जाती है, लेकिन हकीकत में उनके खेतों तक गाड़ियां नहीं पहुंच रही हैं।
तैयार फसल की कटाई का समय बीत चुका है। समय पर कटाई न होने से केला पौधों पर ही पकने लगा है और खराब हो रहा है। मंडी प्रशासन और व्यापारियों की इस बेरुखी का सीधा असर फसल की क्वालिटी और उसके बाजार मूल्य पर पड़ रहा है। कई किसान मजबूरन पका हुआ केला खुद काटने को मजबूर हैं, तो कई मंडी नीलामी प्रक्रिया पर टकटकी लगाए बैठे हैं।
“14 महीने की मेहनत और लाखों का खर्च दांव पर” — पीड़ित किसानों का दर्द
स्थानीय किसानों का कहना है कि केले की फसल को बच्चों की तरह सींचना पड़ता है। एक-एक पौधा तैयार करने में 12 से 14 महीने की कड़ी मेहनत, सिंचाई, खाद, दवाइयों और मजदूरी पर भारी लागत आती है।
किसान ओमराज पुंडलिक ने बताया:
“केले की फसल को तैयार करने में 12 से 14 महीने का समय लगता है। पूरी मेहनत के बाद जब फसल बेचने का समय आया, तो व्यापारी खेत में आने को तैयार नहीं हैं। समय पर कटाई न होने से केला पौधे पर ही पक रहा है, जिससे इसकी क्वालिटी और रेट दोनों गिर रहे हैं।”
किसान विजय बाविस्कर ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा:
“एक साल तक खाद, पानी और मजदूरी पर बड़ा खर्च करने के बाद अब जब फसल कटने की स्थिति में है, तो व्यापारी केला नहीं काट रहे। खेतों में फसल पककर बर्बाद हो रही है और हमें भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।”
मंडी प्रशासन की सफाई: “सीजन समाप्ति की ओर, अच्छी क्वालिटी का उठ रहा माल”
दूसरी ओर, मंडी प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ता नजर आ रहा है। रेणुका माता मंडी स्थित केला नीलामी केंद्र के अधिकारियों का तर्क है कि अब केला सीजन समाप्ति की ओर है, इसलिए आवक में बदलाव आ रहा है।
जगदीश चौधरी (प्रभारी, केला नीलामी केंद्र):
“केला सीजन अब समाप्ति की ओर है। जिन खेतों में ज्यादा और बेहतर क्वालिटी का केला तैयार है, व्यापारी वहां से नियमित कटाई कर रहे हैं और किसानों को अच्छा भाव भी मिल रहा है। मंडी में रोजाना 50, 80 से 100 गाड़ियों की आवक बनी हुई है।”
प्रशासन और सरकार से मदद की गुहार
मंडी प्रशासन के दावों के विपरीत धरातल पर स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। किसानों का कहना है कि कागजों और बयानों में गाड़ियों की संख्या भले दर्ज हो रही हो, लेकिन जमीनी स्तर पर किसान अपनी फसल को सड़ते देखने पर मजबूर हैं। प्रभावित गांवों के किसानों ने अब राज्य सरकार और जिला प्रशासन से गुहार लगाई है कि नीलामी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए और खेतों से केला कटाई की सुचारु व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि किसानों को इस आर्थिक तबाही से बचाया जा सके।




