Friday, March 13, 2026
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ramadannewsजानिए इस शहर में पवित्र माह रमजान में चली आ रही अनूठी परंपरा

यह खबर भी जरूर पढें -Ramdannewsबुरहानपुर में पवित्र माह रमजान में रोजा करने के लिए सेहरी भोज में बडे आकार की डबल रोटी सेवन की है अनूठी परंपर

शहर की जामा मस्जिद के दो ऊंचे मीनारो पर रोशनी देखकर रोजाना अपना रोजा छोडते है हजारो रोजदार

ramadannewsबुरहानपुर (स्पेशल रिपोर्टर ) मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक और मुस्लिम बाहुल्य शहर बुरहानपुर में पवित्र माह रमजान में एक अनूठी परंपरा है शहर के बीचोबीच स्थित ऐतिहासिक शाही जामा मस्जिद जिसके दो 125 -125 फीट उंचे मीनार है पवित्र माह रमजान में रोजाना सूर्यास्त के बाद हजारों रोजदारों की इन ऊंचे ऊंचे मीनारों पर नजर टिक जाती है जैसे ही इन दोनों मीनारों पर रंग बिरंगी रोशनी जलती है वैसे दिनभर से भूखे प्यासे रोजदार अपना अपना रोजा छोडते है जो रोजदार जामा मस्जिद के ऊंचे ऊंचे मीनारों की रोशनी को जलते नहीं देख पाता मोहल्लों की मस्जिदों के पदाधिकारी इन मीनारों की रोशनी जलते ही अपनी मस्जिदों की रोशनी करके और माइक में रोजा छोडने का ऐलान करते है कुल मिलाकर बुरहानपुर शहर में शाही जामा मस्जिद के मीनारों की रोशनी होते ही हजारों रोजदारो के व्दारा अपना रोजा छोडने की अनूठी परंपरा है

क्या है यह परंपरा

बुरहानपुर के इतिहास के जानकार मोहम्मद नौशाद ने बताया बुरहानपुर एक ऐतिहासिक शहर है शहर के बीचोंबीच फारूखी शासक आदिलशाह फारूखी ने काले पत्थर से जामा मस्जिद का निर्माण कराया 1585 में 14 साल की अवधि में जामा मस्जिद बनकर तैयार हुई इसके दो मीनार है जिनकी ऊंचाई 125 -125 फीट है
जब से मस्जिद का निर्माण हुआ तब से 1960 तक पवित्र माह रमजान में रोजा छोडने का ऐलान टोप के गोले से चलाकर किया जाता है जिसकी आवाज दूर दूर तक जाने के बाद रोजदारों को यह पता चल जाता था कि रोजा छोडने का समय हो गया उसके बाद दीपावली पर फोडा जाने वाला पटाखा जिसे स्थानीय भाषा में गजकुंडी कहा जाता था उसका उपयोग किया जाने लगा लेकिन इसे मस्जिद प्रबंधन ने अधिक समय तक उपयोग नहीं किया
इसके बाद विद्युत प्रकाश का जमाना आया मस्जिद को सबसे पहले 1974 में विद्युत प्रकाश से डेकोरेट किया गया इसके बाद 1980 में मस्जिद के दोनो ऊंचे उंचे मीनारों पर विद्युत प्रकाश लगाया गया तब से पवित्र माह रमजान के समय रोजा इफ्तार यानी रोजा छोडने का ऐलान इन दोनो मीनारो पर लगाई गई विदुयत प्रकाश को जलाकर किया जाने लगा इन दोनों मीनारों की लाईट 15 से 20 किलोमीटर की परिधि में दिखाई देता है

रमजान , ईद व बकरी ईद चांद दिखने का भी होता है ऐलान

इतिहास के जानकार मोहम्मद नौशाद ने बताया जामा मस्जिद के मीनारों पर लगे इस विद्युत प्रकाश पवित्र माह रमजान में रोजा इफ्तार के ऐलान के साथ साथ पवित माह रमजान का चांद, रमजान ईद और बकरा ईद के चांद दिखाई देने के लिए भी किया जाता है आज के आधुनिक और तेजी से संदेश प्रसारित करने वाले माध्यम सोशल मीडिया के दौर में भी 5 दशक से चली आ रही इस परंपरा के प्रासंगिक होने के पीछ कारण शहर की एकता प्रदर्शित करने को मानते है
शाही जामा मस्जिद मुस्लिम समाज के लिए केंद्रीय दर्जा
शहर के डॉक्टर व समाजसेवी डॉ फरीद काजी बताते है शाही जामा मस्जिद बुरहानपुर के मुस्लिम समाज सेंटर है और मस्जिद के शाही पेश इमाम सैय्यद इकराम उल्ला बुखारी मुस्लिम समाज के मजहबी पेशवा है जामा मस्जिद के उंचे मीनारों पर पवित्र माह रमजान में रोजा इफ्तार यानी रोजा छोडने के ऐलान के लिए रोशनी की जाती है यह हमारे शहर की एक अनूठी परंपरा है जो शायद ही किसी शहर में देखने को मिलती

मुस्लिम युवा इस परंपरा को मानते है शाही अंदाज

हालांकि मुस्लिम समाज के युवा सूचनाओं को जानने के लिए सोशल मीडिया को सबसे तेज माध्यम मानते है लेकिन रमजान के महीने में जामा मस्जिद के दो ऊंचे मीनारों पर रोजा छोडने की सूचना के लिए रोशनी करने की परंपरा को युवा इसे शाही अंदाज बताते है युवा हाजी अब्दुल बासित का कहना है जामा मस्जिद के शाही इमाम के पुत्र जो कि युवा है और जामा मस्जिद के मुतावल्ली (प्रबंधक) है उनके व्दारा इस परंपरा के साथ साथ सोशल मीडिया का उपयोग किया जाता है उनके व्दारा सोशल मीडिया के माध्यम से रोजा इफ्तार का समय सेहरी का समय और ईद के चांद दिखाई देने की सूचना दी जाती है लेकिन मस्जिद के मीनारो रोजा इफ्तार व चांद दिखाई देने की सूचना के लिए रोशनी जलाने की यह परंपरा शाही अंदाज है

परंपरा नहीं अब विरासत है

युवा डॉ इमरान खान का कहना है शाही जामा मस्जिद मुस्लिम समाज का सबसे प्रमुख सेंटर है कई दशकों से पवित्र माह रमजान में रोजा इफ्तार रोजा छोडने की सूचना और ईद का चांद दिखाई देने की सूचना शहर वासियों को मस्जिद के दो ऊंचे मीनारों पर रोशनी करके दी जाती है अब यह परंपरा नहीं हमारी विरासत बन गई है जब कोई परंपरा विरासत बन जाती है तो नई पीढी अपनी विरासत को संजोती है हमे उम्मीद है कितनी भी आधुनिकता हो जाए हमारी यह विरासत बनी परंपरा जारी रहेगी

यह खबर भी जरूर पढें – IranAmericaWarइरान के खिलाफ अमेरिका इजरायल के युध्द का ड्रायफुट्स बाजार पर असर

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क्या है यह परंपरा

बुरहानपुर के इतिहास के जानकार मोहम्मद नौशाद ने बताया बुरहानपुर एक ऐतिहासिक शहर है शहर के बीचोंबीच फारूखी शासक आदिलशाह फारूखी ने काले पत्थर से जामा मस्जिद का निर्माण कराया 1585 में 14 साल की अवधि में जामा मस्जिद बनकर तैयार हुई इसके दो मीनार है जिनकी ऊंचाई 125 -125 फीट है
जब से मस्जिद का निर्माण हुआ तब से 1960 तक पवित्र माह रमजान में रोजा छोडने का ऐलान टोप के गोले से चलाकर किया जाता है जिसकी आवाज दूर दूर तक जाने के बाद रोजदारों को यह पता चल जाता था कि रोजा छोडने का समय हो गया उसके बाद दीपावली पर फोडा जाने वाला पटाखा जिसे स्थानीय भाषा में गजकुंडी कहा जाता था उसका उपयोग किया जाने लगा लेकिन इसे मस्जिद प्रबंधन ने अधिक समय तक उपयोग नहीं किया
इसके बाद विद्युत प्रकाश का जमाना आया मस्जिद को सबसे पहले 1974 में विद्युत प्रकाश से डेकोरेट किया गया इसके बाद 1980 में मस्जिद के दोनो ऊंचे उंचे मीनारों पर विद्युत प्रकाश लगाया गया तब से पवित्र माह रमजान के समय रोजा इफ्तार यानी रोजा छोडने का ऐलान इन दोनो मीनारो पर लगाई गई विदुयत प्रकाश को जलाकर किया जाने लगा इन दोनों मीनारों की लाईट 15 से 20 किलोमीटर की परिधि में दिखाई देता है

रमजान , ईद व बकरी ईद चांद दिखने का भी होता है ऐलान

इतिहास के जानकार मोहम्मद नौशाद ने बताया जामा मस्जिद के मीनारों पर लगे इस विद्युत प्रकाश पवित्र माह रमजान में रोजा इफ्तार के ऐलान के साथ साथ पवित माह रमजान का चांद, रमजान ईद और बकरा ईद के चांद दिखाई देने के लिए भी किया जाता है आज के आधुनिक और तेजी से संदेश प्रसारित करने वाले माध्यम सोशल मीडिया के दौर में भी 5 दशक से चली आ रही इस परंपरा के प्रासंगिक होने के पीछ कारण शहर की एकता प्रदर्शित करने को मानते है
शाही जामा मस्जिद मुस्लिम समाज के लिए केंद्रीय दर्जा
शहर के डॉक्टर व समाजसेवी डॉ फरीद काजी बताते है शाही जामा मस्जिद बुरहानपुर के मुस्लिम समाज सेंटर है और मस्जिद के शाही पेश इमाम सैय्यद इकराम उल्ला बुखारी मुस्लिम समाज के मजहबी पेशवा है जामा मस्जिद के उंचे मीनारों पर पवित्र माह रमजान में रोजा इफ्तार यानी रोजा छोडने के ऐलान के लिए रोशनी की जाती है यह हमारे शहर की एक अनूठी परंपरा है जो शायद ही किसी शहर में देखने को मिलती

मुस्लिम युवा इस परंपरा को मानते है शाही अंदाज

हालांकि मुस्लिम समाज के युवा सूचनाओं को जानने के लिए सोशल मीडिया को सबसे तेज माध्यम मानते है लेकिन रमजान के महीने में जामा मस्जिद के दो ऊंचे मीनारों पर रोजा छोडने की सूचना के लिए रोशनी करने की परंपरा को युवा इसे शाही अंदाज बताते है युवा हाजी अब्दुल बासित का कहना है जामा मस्जिद के शाही इमाम के पुत्र जो कि युवा है और जामा मस्जिद के मुतावल्ली (प्रबंधक) है उनके व्दारा इस परंपरा के साथ साथ सोशल मीडिया का उपयोग किया जाता है उनके व्दारा सोशल मीडिया के माध्यम से रोजा इफ्तार का समय सेहरी का समय और ईद के चांद दिखाई देने की सूचना दी जाती है लेकिन मस्जिद के मीनारो रोजा इफ्तार व चांद दिखाई देने की सूचना के लिए रोशनी जलाने की यह परंपरा शाही अंदाज है

परंपरा नहीं अब विरासत है

युवा डॉ इमरान खान का कहना है शाही जामा मस्जिद मुस्लिम समाज का सबसे प्रमुख सेंटर है कई दशकों से पवित्र माह रमजान में रोजा इफ्तार रोजा छोडने की सूचना और ईद का चांद दिखाई देने की सूचना शहर वासियों को मस्जिद के दो ऊंचे मीनारों पर रोशनी करके दी जाती है अब यह परंपरा नहीं हमारी विरासत बन गई है जब कोई परंपरा विरासत बन जाती है तो नई पीढी अपनी विरासत को संजोती है हमे उम्मीद है कितनी भी आधुनिकता हो जाए हमारी यह विरासत बनी परंपरा जारी रहेगी

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ramadannewsबुरहानपुर (स्पेशल रिपोर्टर ) मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक और मुस्लिम बाहुल्य शहर बुरहानपुर में पवित्र माह रमजान में एक अनूठी परंपरा है शहर के बीचोबीच स्थित ऐतिहासिक शाही जामा मस्जिद जिसके दो 125 -125 फीट उंचे मीनार है पवित्र माह रमजान में रोजाना सूर्यास्त के बाद हजारों रोजदारों की इन ऊंचे ऊंचे मीनारों पर नजर टिक जाती है जैसे ही इन दोनों मीनारों पर रंग बिरंगी रोशनी जलती है वैसे दिनभर से भूखे प्यासे रोजदार अपना अपना रोजा छोडते है जो रोजदार जामा मस्जिद के ऊंचे ऊंचे मीनारों की रोशनी को जलते नहीं देख पाता मोहल्लों की मस्जिदों के पदाधिकारी इन मीनारों की रोशनी जलते ही अपनी मस्जिदों की रोशनी करके और माइक में रोजा छोडने का ऐलान करते है कुल मिलाकर बुरहानपुर शहर में शाही जामा मस्जिद के मीनारों की रोशनी होते ही हजारों रोजदारो के व्दारा अपना रोजा छोडने की अनूठी परंपरा है

क्या है यह परंपरा

बुरहानपुर के इतिहास के जानकार मोहम्मद नौशाद ने बताया बुरहानपुर एक ऐतिहासिक शहर है शहर के बीचोंबीच फारूखी शासक आदिलशाह फारूखी ने काले पत्थर से जामा मस्जिद का निर्माण कराया 1585 में 14 साल की अवधि में जामा मस्जिद बनकर तैयार हुई इसके दो मीनार है जिनकी ऊंचाई 125 -125 फीट है
जब से मस्जिद का निर्माण हुआ तब से 1960 तक पवित्र माह रमजान में रोजा छोडने का ऐलान टोप के गोले से चलाकर किया जाता है जिसकी आवाज दूर दूर तक जाने के बाद रोजदारों को यह पता चल जाता था कि रोजा छोडने का समय हो गया उसके बाद दीपावली पर फोडा जाने वाला पटाखा जिसे स्थानीय भाषा में गजकुंडी कहा जाता था उसका उपयोग किया जाने लगा लेकिन इसे मस्जिद प्रबंधन ने अधिक समय तक उपयोग नहीं किया
इसके बाद विद्युत प्रकाश का जमाना आया मस्जिद को सबसे पहले 1974 में विद्युत प्रकाश से डेकोरेट किया गया इसके बाद 1980 में मस्जिद के दोनो ऊंचे उंचे मीनारों पर विद्युत प्रकाश लगाया गया तब से पवित्र माह रमजान के समय रोजा इफ्तार यानी रोजा छोडने का ऐलान इन दोनो मीनारो पर लगाई गई विदुयत प्रकाश को जलाकर किया जाने लगा इन दोनों मीनारों की लाईट 15 से 20 किलोमीटर की परिधि में दिखाई देता है

रमजान , ईद व बकरी ईद चांद दिखने का भी होता है ऐलान

इतिहास के जानकार मोहम्मद नौशाद ने बताया जामा मस्जिद के मीनारों पर लगे इस विद्युत प्रकाश पवित्र माह रमजान में रोजा इफ्तार के ऐलान के साथ साथ पवित माह रमजान का चांद, रमजान ईद और बकरा ईद के चांद दिखाई देने के लिए भी किया जाता है आज के आधुनिक और तेजी से संदेश प्रसारित करने वाले माध्यम सोशल मीडिया के दौर में भी 5 दशक से चली आ रही इस परंपरा के प्रासंगिक होने के पीछ कारण शहर की एकता प्रदर्शित करने को मानते है
शाही जामा मस्जिद मुस्लिम समाज के लिए केंद्रीय दर्जा
शहर के डॉक्टर व समाजसेवी डॉ फरीद काजी बताते है शाही जामा मस्जिद बुरहानपुर के मुस्लिम समाज सेंटर है और मस्जिद के शाही पेश इमाम सैय्यद इकराम उल्ला बुखारी मुस्लिम समाज के मजहबी पेशवा है जामा मस्जिद के उंचे मीनारों पर पवित्र माह रमजान में रोजा इफ्तार यानी रोजा छोडने के ऐलान के लिए रोशनी की जाती है यह हमारे शहर की एक अनूठी परंपरा है जो शायद ही किसी शहर में देखने को मिलती

मुस्लिम युवा इस परंपरा को मानते है शाही अंदाज

हालांकि मुस्लिम समाज के युवा सूचनाओं को जानने के लिए सोशल मीडिया को सबसे तेज माध्यम मानते है लेकिन रमजान के महीने में जामा मस्जिद के दो ऊंचे मीनारों पर रोजा छोडने की सूचना के लिए रोशनी करने की परंपरा को युवा इसे शाही अंदाज बताते है युवा हाजी अब्दुल बासित का कहना है जामा मस्जिद के शाही इमाम के पुत्र जो कि युवा है और जामा मस्जिद के मुतावल्ली (प्रबंधक) है उनके व्दारा इस परंपरा के साथ साथ सोशल मीडिया का उपयोग किया जाता है उनके व्दारा सोशल मीडिया के माध्यम से रोजा इफ्तार का समय सेहरी का समय और ईद के चांद दिखाई देने की सूचना दी जाती है लेकिन मस्जिद के मीनारो रोजा इफ्तार व चांद दिखाई देने की सूचना के लिए रोशनी जलाने की यह परंपरा शाही अंदाज है

परंपरा नहीं अब विरासत है

युवा डॉ इमरान खान का कहना है शाही जामा मस्जिद मुस्लिम समाज का सबसे प्रमुख सेंटर है कई दशकों से पवित्र माह रमजान में रोजा इफ्तार रोजा छोडने की सूचना और ईद का चांद दिखाई देने की सूचना शहर वासियों को मस्जिद के दो ऊंचे मीनारों पर रोशनी करके दी जाती है अब यह परंपरा नहीं हमारी विरासत बन गई है जब कोई परंपरा विरासत बन जाती है तो नई पीढी अपनी विरासत को संजोती है हमे उम्मीद है कितनी भी आधुनिकता हो जाए हमारी यह विरासत बनी परंपरा जारी रहेगी

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क्या है यह परंपरा

बुरहानपुर के इतिहास के जानकार मोहम्मद नौशाद ने बताया बुरहानपुर एक ऐतिहासिक शहर है शहर के बीचोंबीच फारूखी शासक आदिलशाह फारूखी ने काले पत्थर से जामा मस्जिद का निर्माण कराया 1585 में 14 साल की अवधि में जामा मस्जिद बनकर तैयार हुई इसके दो मीनार है जिनकी ऊंचाई 125 -125 फीट है
जब से मस्जिद का निर्माण हुआ तब से 1960 तक पवित्र माह रमजान में रोजा छोडने का ऐलान टोप के गोले से चलाकर किया जाता है जिसकी आवाज दूर दूर तक जाने के बाद रोजदारों को यह पता चल जाता था कि रोजा छोडने का समय हो गया उसके बाद दीपावली पर फोडा जाने वाला पटाखा जिसे स्थानीय भाषा में गजकुंडी कहा जाता था उसका उपयोग किया जाने लगा लेकिन इसे मस्जिद प्रबंधन ने अधिक समय तक उपयोग नहीं किया
इसके बाद विद्युत प्रकाश का जमाना आया मस्जिद को सबसे पहले 1974 में विद्युत प्रकाश से डेकोरेट किया गया इसके बाद 1980 में मस्जिद के दोनो ऊंचे उंचे मीनारों पर विद्युत प्रकाश लगाया गया तब से पवित्र माह रमजान के समय रोजा इफ्तार यानी रोजा छोडने का ऐलान इन दोनो मीनारो पर लगाई गई विदुयत प्रकाश को जलाकर किया जाने लगा इन दोनों मीनारों की लाईट 15 से 20 किलोमीटर की परिधि में दिखाई देता है

रमजान , ईद व बकरी ईद चांद दिखने का भी होता है ऐलान

इतिहास के जानकार मोहम्मद नौशाद ने बताया जामा मस्जिद के मीनारों पर लगे इस विद्युत प्रकाश पवित्र माह रमजान में रोजा इफ्तार के ऐलान के साथ साथ पवित माह रमजान का चांद, रमजान ईद और बकरा ईद के चांद दिखाई देने के लिए भी किया जाता है आज के आधुनिक और तेजी से संदेश प्रसारित करने वाले माध्यम सोशल मीडिया के दौर में भी 5 दशक से चली आ रही इस परंपरा के प्रासंगिक होने के पीछ कारण शहर की एकता प्रदर्शित करने को मानते है
शाही जामा मस्जिद मुस्लिम समाज के लिए केंद्रीय दर्जा
शहर के डॉक्टर व समाजसेवी डॉ फरीद काजी बताते है शाही जामा मस्जिद बुरहानपुर के मुस्लिम समाज सेंटर है और मस्जिद के शाही पेश इमाम सैय्यद इकराम उल्ला बुखारी मुस्लिम समाज के मजहबी पेशवा है जामा मस्जिद के उंचे मीनारों पर पवित्र माह रमजान में रोजा इफ्तार यानी रोजा छोडने के ऐलान के लिए रोशनी की जाती है यह हमारे शहर की एक अनूठी परंपरा है जो शायद ही किसी शहर में देखने को मिलती

मुस्लिम युवा इस परंपरा को मानते है शाही अंदाज

हालांकि मुस्लिम समाज के युवा सूचनाओं को जानने के लिए सोशल मीडिया को सबसे तेज माध्यम मानते है लेकिन रमजान के महीने में जामा मस्जिद के दो ऊंचे मीनारों पर रोजा छोडने की सूचना के लिए रोशनी करने की परंपरा को युवा इसे शाही अंदाज बताते है युवा हाजी अब्दुल बासित का कहना है जामा मस्जिद के शाही इमाम के पुत्र जो कि युवा है और जामा मस्जिद के मुतावल्ली (प्रबंधक) है उनके व्दारा इस परंपरा के साथ साथ सोशल मीडिया का उपयोग किया जाता है उनके व्दारा सोशल मीडिया के माध्यम से रोजा इफ्तार का समय सेहरी का समय और ईद के चांद दिखाई देने की सूचना दी जाती है लेकिन मस्जिद के मीनारो रोजा इफ्तार व चांद दिखाई देने की सूचना के लिए रोशनी जलाने की यह परंपरा शाही अंदाज है

परंपरा नहीं अब विरासत है

युवा डॉ इमरान खान का कहना है शाही जामा मस्जिद मुस्लिम समाज का सबसे प्रमुख सेंटर है कई दशकों से पवित्र माह रमजान में रोजा इफ्तार रोजा छोडने की सूचना और ईद का चांद दिखाई देने की सूचना शहर वासियों को मस्जिद के दो ऊंचे मीनारों पर रोशनी करके दी जाती है अब यह परंपरा नहीं हमारी विरासत बन गई है जब कोई परंपरा विरासत बन जाती है तो नई पीढी अपनी विरासत को संजोती है हमे उम्मीद है कितनी भी आधुनिकता हो जाए हमारी यह विरासत बनी परंपरा जारी रहेगी

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शहर की जामा मस्जिद के दो ऊंचे मीनारो पर रोशनी देखकर रोजाना अपना रोजा छोडते है हजारो रोजदार

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क्या है यह परंपरा

बुरहानपुर के इतिहास के जानकार मोहम्मद नौशाद ने बताया बुरहानपुर एक ऐतिहासिक शहर है शहर के बीचोंबीच फारूखी शासक आदिलशाह फारूखी ने काले पत्थर से जामा मस्जिद का निर्माण कराया 1585 में 14 साल की अवधि में जामा मस्जिद बनकर तैयार हुई इसके दो मीनार है जिनकी ऊंचाई 125 -125 फीट है
जब से मस्जिद का निर्माण हुआ तब से 1960 तक पवित्र माह रमजान में रोजा छोडने का ऐलान टोप के गोले से चलाकर किया जाता है जिसकी आवाज दूर दूर तक जाने के बाद रोजदारों को यह पता चल जाता था कि रोजा छोडने का समय हो गया उसके बाद दीपावली पर फोडा जाने वाला पटाखा जिसे स्थानीय भाषा में गजकुंडी कहा जाता था उसका उपयोग किया जाने लगा लेकिन इसे मस्जिद प्रबंधन ने अधिक समय तक उपयोग नहीं किया
इसके बाद विद्युत प्रकाश का जमाना आया मस्जिद को सबसे पहले 1974 में विद्युत प्रकाश से डेकोरेट किया गया इसके बाद 1980 में मस्जिद के दोनो ऊंचे उंचे मीनारों पर विद्युत प्रकाश लगाया गया तब से पवित्र माह रमजान के समय रोजा इफ्तार यानी रोजा छोडने का ऐलान इन दोनो मीनारो पर लगाई गई विदुयत प्रकाश को जलाकर किया जाने लगा इन दोनों मीनारों की लाईट 15 से 20 किलोमीटर की परिधि में दिखाई देता है

रमजान , ईद व बकरी ईद चांद दिखने का भी होता है ऐलान

इतिहास के जानकार मोहम्मद नौशाद ने बताया जामा मस्जिद के मीनारों पर लगे इस विद्युत प्रकाश पवित्र माह रमजान में रोजा इफ्तार के ऐलान के साथ साथ पवित माह रमजान का चांद, रमजान ईद और बकरा ईद के चांद दिखाई देने के लिए भी किया जाता है आज के आधुनिक और तेजी से संदेश प्रसारित करने वाले माध्यम सोशल मीडिया के दौर में भी 5 दशक से चली आ रही इस परंपरा के प्रासंगिक होने के पीछ कारण शहर की एकता प्रदर्शित करने को मानते है
शाही जामा मस्जिद मुस्लिम समाज के लिए केंद्रीय दर्जा
शहर के डॉक्टर व समाजसेवी डॉ फरीद काजी बताते है शाही जामा मस्जिद बुरहानपुर के मुस्लिम समाज सेंटर है और मस्जिद के शाही पेश इमाम सैय्यद इकराम उल्ला बुखारी मुस्लिम समाज के मजहबी पेशवा है जामा मस्जिद के उंचे मीनारों पर पवित्र माह रमजान में रोजा इफ्तार यानी रोजा छोडने के ऐलान के लिए रोशनी की जाती है यह हमारे शहर की एक अनूठी परंपरा है जो शायद ही किसी शहर में देखने को मिलती

मुस्लिम युवा इस परंपरा को मानते है शाही अंदाज

हालांकि मुस्लिम समाज के युवा सूचनाओं को जानने के लिए सोशल मीडिया को सबसे तेज माध्यम मानते है लेकिन रमजान के महीने में जामा मस्जिद के दो ऊंचे मीनारों पर रोजा छोडने की सूचना के लिए रोशनी करने की परंपरा को युवा इसे शाही अंदाज बताते है युवा हाजी अब्दुल बासित का कहना है जामा मस्जिद के शाही इमाम के पुत्र जो कि युवा है और जामा मस्जिद के मुतावल्ली (प्रबंधक) है उनके व्दारा इस परंपरा के साथ साथ सोशल मीडिया का उपयोग किया जाता है उनके व्दारा सोशल मीडिया के माध्यम से रोजा इफ्तार का समय सेहरी का समय और ईद के चांद दिखाई देने की सूचना दी जाती है लेकिन मस्जिद के मीनारो रोजा इफ्तार व चांद दिखाई देने की सूचना के लिए रोशनी जलाने की यह परंपरा शाही अंदाज है

परंपरा नहीं अब विरासत है

युवा डॉ इमरान खान का कहना है शाही जामा मस्जिद मुस्लिम समाज का सबसे प्रमुख सेंटर है कई दशकों से पवित्र माह रमजान में रोजा इफ्तार रोजा छोडने की सूचना और ईद का चांद दिखाई देने की सूचना शहर वासियों को मस्जिद के दो ऊंचे मीनारों पर रोशनी करके दी जाती है अब यह परंपरा नहीं हमारी विरासत बन गई है जब कोई परंपरा विरासत बन जाती है तो नई पीढी अपनी विरासत को संजोती है हमे उम्मीद है कितनी भी आधुनिकता हो जाए हमारी यह विरासत बनी परंपरा जारी रहेगी

यह खबर भी जरूर पढें – IranAmericaWarइरान के खिलाफ अमेरिका इजरायल के युध्द का ड्रायफुट्स बाजार पर असर

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शहर की जामा मस्जिद के दो ऊंचे मीनारो पर रोशनी देखकर रोजाना अपना रोजा छोडते है हजारो रोजदार

ramadannewsबुरहानपुर (स्पेशल रिपोर्टर ) मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक और मुस्लिम बाहुल्य शहर बुरहानपुर में पवित्र माह रमजान में एक अनूठी परंपरा है शहर के बीचोबीच स्थित ऐतिहासिक शाही जामा मस्जिद जिसके दो 125 -125 फीट उंचे मीनार है पवित्र माह रमजान में रोजाना सूर्यास्त के बाद हजारों रोजदारों की इन ऊंचे ऊंचे मीनारों पर नजर टिक जाती है जैसे ही इन दोनों मीनारों पर रंग बिरंगी रोशनी जलती है वैसे दिनभर से भूखे प्यासे रोजदार अपना अपना रोजा छोडते है जो रोजदार जामा मस्जिद के ऊंचे ऊंचे मीनारों की रोशनी को जलते नहीं देख पाता मोहल्लों की मस्जिदों के पदाधिकारी इन मीनारों की रोशनी जलते ही अपनी मस्जिदों की रोशनी करके और माइक में रोजा छोडने का ऐलान करते है कुल मिलाकर बुरहानपुर शहर में शाही जामा मस्जिद के मीनारों की रोशनी होते ही हजारों रोजदारो के व्दारा अपना रोजा छोडने की अनूठी परंपरा है

क्या है यह परंपरा

बुरहानपुर के इतिहास के जानकार मोहम्मद नौशाद ने बताया बुरहानपुर एक ऐतिहासिक शहर है शहर के बीचोंबीच फारूखी शासक आदिलशाह फारूखी ने काले पत्थर से जामा मस्जिद का निर्माण कराया 1585 में 14 साल की अवधि में जामा मस्जिद बनकर तैयार हुई इसके दो मीनार है जिनकी ऊंचाई 125 -125 फीट है
जब से मस्जिद का निर्माण हुआ तब से 1960 तक पवित्र माह रमजान में रोजा छोडने का ऐलान टोप के गोले से चलाकर किया जाता है जिसकी आवाज दूर दूर तक जाने के बाद रोजदारों को यह पता चल जाता था कि रोजा छोडने का समय हो गया उसके बाद दीपावली पर फोडा जाने वाला पटाखा जिसे स्थानीय भाषा में गजकुंडी कहा जाता था उसका उपयोग किया जाने लगा लेकिन इसे मस्जिद प्रबंधन ने अधिक समय तक उपयोग नहीं किया
इसके बाद विद्युत प्रकाश का जमाना आया मस्जिद को सबसे पहले 1974 में विद्युत प्रकाश से डेकोरेट किया गया इसके बाद 1980 में मस्जिद के दोनो ऊंचे उंचे मीनारों पर विद्युत प्रकाश लगाया गया तब से पवित्र माह रमजान के समय रोजा इफ्तार यानी रोजा छोडने का ऐलान इन दोनो मीनारो पर लगाई गई विदुयत प्रकाश को जलाकर किया जाने लगा इन दोनों मीनारों की लाईट 15 से 20 किलोमीटर की परिधि में दिखाई देता है

रमजान , ईद व बकरी ईद चांद दिखने का भी होता है ऐलान

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शाही जामा मस्जिद मुस्लिम समाज के लिए केंद्रीय दर्जा
शहर के डॉक्टर व समाजसेवी डॉ फरीद काजी बताते है शाही जामा मस्जिद बुरहानपुर के मुस्लिम समाज सेंटर है और मस्जिद के शाही पेश इमाम सैय्यद इकराम उल्ला बुखारी मुस्लिम समाज के मजहबी पेशवा है जामा मस्जिद के उंचे मीनारों पर पवित्र माह रमजान में रोजा इफ्तार यानी रोजा छोडने के ऐलान के लिए रोशनी की जाती है यह हमारे शहर की एक अनूठी परंपरा है जो शायद ही किसी शहर में देखने को मिलती

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परंपरा नहीं अब विरासत है

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क्या है यह परंपरा

बुरहानपुर के इतिहास के जानकार मोहम्मद नौशाद ने बताया बुरहानपुर एक ऐतिहासिक शहर है शहर के बीचोंबीच फारूखी शासक आदिलशाह फारूखी ने काले पत्थर से जामा मस्जिद का निर्माण कराया 1585 में 14 साल की अवधि में जामा मस्जिद बनकर तैयार हुई इसके दो मीनार है जिनकी ऊंचाई 125 -125 फीट है
जब से मस्जिद का निर्माण हुआ तब से 1960 तक पवित्र माह रमजान में रोजा छोडने का ऐलान टोप के गोले से चलाकर किया जाता है जिसकी आवाज दूर दूर तक जाने के बाद रोजदारों को यह पता चल जाता था कि रोजा छोडने का समय हो गया उसके बाद दीपावली पर फोडा जाने वाला पटाखा जिसे स्थानीय भाषा में गजकुंडी कहा जाता था उसका उपयोग किया जाने लगा लेकिन इसे मस्जिद प्रबंधन ने अधिक समय तक उपयोग नहीं किया
इसके बाद विद्युत प्रकाश का जमाना आया मस्जिद को सबसे पहले 1974 में विद्युत प्रकाश से डेकोरेट किया गया इसके बाद 1980 में मस्जिद के दोनो ऊंचे उंचे मीनारों पर विद्युत प्रकाश लगाया गया तब से पवित्र माह रमजान के समय रोजा इफ्तार यानी रोजा छोडने का ऐलान इन दोनो मीनारो पर लगाई गई विदुयत प्रकाश को जलाकर किया जाने लगा इन दोनों मीनारों की लाईट 15 से 20 किलोमीटर की परिधि में दिखाई देता है

रमजान , ईद व बकरी ईद चांद दिखने का भी होता है ऐलान

इतिहास के जानकार मोहम्मद नौशाद ने बताया जामा मस्जिद के मीनारों पर लगे इस विद्युत प्रकाश पवित्र माह रमजान में रोजा इफ्तार के ऐलान के साथ साथ पवित माह रमजान का चांद, रमजान ईद और बकरा ईद के चांद दिखाई देने के लिए भी किया जाता है आज के आधुनिक और तेजी से संदेश प्रसारित करने वाले माध्यम सोशल मीडिया के दौर में भी 5 दशक से चली आ रही इस परंपरा के प्रासंगिक होने के पीछ कारण शहर की एकता प्रदर्शित करने को मानते है
शाही जामा मस्जिद मुस्लिम समाज के लिए केंद्रीय दर्जा
शहर के डॉक्टर व समाजसेवी डॉ फरीद काजी बताते है शाही जामा मस्जिद बुरहानपुर के मुस्लिम समाज सेंटर है और मस्जिद के शाही पेश इमाम सैय्यद इकराम उल्ला बुखारी मुस्लिम समाज के मजहबी पेशवा है जामा मस्जिद के उंचे मीनारों पर पवित्र माह रमजान में रोजा इफ्तार यानी रोजा छोडने के ऐलान के लिए रोशनी की जाती है यह हमारे शहर की एक अनूठी परंपरा है जो शायद ही किसी शहर में देखने को मिलती

मुस्लिम युवा इस परंपरा को मानते है शाही अंदाज

हालांकि मुस्लिम समाज के युवा सूचनाओं को जानने के लिए सोशल मीडिया को सबसे तेज माध्यम मानते है लेकिन रमजान के महीने में जामा मस्जिद के दो ऊंचे मीनारों पर रोजा छोडने की सूचना के लिए रोशनी करने की परंपरा को युवा इसे शाही अंदाज बताते है युवा हाजी अब्दुल बासित का कहना है जामा मस्जिद के शाही इमाम के पुत्र जो कि युवा है और जामा मस्जिद के मुतावल्ली (प्रबंधक) है उनके व्दारा इस परंपरा के साथ साथ सोशल मीडिया का उपयोग किया जाता है उनके व्दारा सोशल मीडिया के माध्यम से रोजा इफ्तार का समय सेहरी का समय और ईद के चांद दिखाई देने की सूचना दी जाती है लेकिन मस्जिद के मीनारो रोजा इफ्तार व चांद दिखाई देने की सूचना के लिए रोशनी जलाने की यह परंपरा शाही अंदाज है

परंपरा नहीं अब विरासत है

युवा डॉ इमरान खान का कहना है शाही जामा मस्जिद मुस्लिम समाज का सबसे प्रमुख सेंटर है कई दशकों से पवित्र माह रमजान में रोजा इफ्तार रोजा छोडने की सूचना और ईद का चांद दिखाई देने की सूचना शहर वासियों को मस्जिद के दो ऊंचे मीनारों पर रोशनी करके दी जाती है अब यह परंपरा नहीं हमारी विरासत बन गई है जब कोई परंपरा विरासत बन जाती है तो नई पीढी अपनी विरासत को संजोती है हमे उम्मीद है कितनी भी आधुनिकता हो जाए हमारी यह विरासत बनी परंपरा जारी रहेगी

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क्या है यह परंपरा

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इतिहास के जानकार मोहम्मद नौशाद ने बताया जामा मस्जिद के मीनारों पर लगे इस विद्युत प्रकाश पवित्र माह रमजान में रोजा इफ्तार के ऐलान के साथ साथ पवित माह रमजान का चांद, रमजान ईद और बकरा ईद के चांद दिखाई देने के लिए भी किया जाता है आज के आधुनिक और तेजी से संदेश प्रसारित करने वाले माध्यम सोशल मीडिया के दौर में भी 5 दशक से चली आ रही इस परंपरा के प्रासंगिक होने के पीछ कारण शहर की एकता प्रदर्शित करने को मानते है
शाही जामा मस्जिद मुस्लिम समाज के लिए केंद्रीय दर्जा
शहर के डॉक्टर व समाजसेवी डॉ फरीद काजी बताते है शाही जामा मस्जिद बुरहानपुर के मुस्लिम समाज सेंटर है और मस्जिद के शाही पेश इमाम सैय्यद इकराम उल्ला बुखारी मुस्लिम समाज के मजहबी पेशवा है जामा मस्जिद के उंचे मीनारों पर पवित्र माह रमजान में रोजा इफ्तार यानी रोजा छोडने के ऐलान के लिए रोशनी की जाती है यह हमारे शहर की एक अनूठी परंपरा है जो शायद ही किसी शहर में देखने को मिलती

मुस्लिम युवा इस परंपरा को मानते है शाही अंदाज

हालांकि मुस्लिम समाज के युवा सूचनाओं को जानने के लिए सोशल मीडिया को सबसे तेज माध्यम मानते है लेकिन रमजान के महीने में जामा मस्जिद के दो ऊंचे मीनारों पर रोजा छोडने की सूचना के लिए रोशनी करने की परंपरा को युवा इसे शाही अंदाज बताते है युवा हाजी अब्दुल बासित का कहना है जामा मस्जिद के शाही इमाम के पुत्र जो कि युवा है और जामा मस्जिद के मुतावल्ली (प्रबंधक) है उनके व्दारा इस परंपरा के साथ साथ सोशल मीडिया का उपयोग किया जाता है उनके व्दारा सोशल मीडिया के माध्यम से रोजा इफ्तार का समय सेहरी का समय और ईद के चांद दिखाई देने की सूचना दी जाती है लेकिन मस्जिद के मीनारो रोजा इफ्तार व चांद दिखाई देने की सूचना के लिए रोशनी जलाने की यह परंपरा शाही अंदाज है

परंपरा नहीं अब विरासत है

युवा डॉ इमरान खान का कहना है शाही जामा मस्जिद मुस्लिम समाज का सबसे प्रमुख सेंटर है कई दशकों से पवित्र माह रमजान में रोजा इफ्तार रोजा छोडने की सूचना और ईद का चांद दिखाई देने की सूचना शहर वासियों को मस्जिद के दो ऊंचे मीनारों पर रोशनी करके दी जाती है अब यह परंपरा नहीं हमारी विरासत बन गई है जब कोई परंपरा विरासत बन जाती है तो नई पीढी अपनी विरासत को संजोती है हमे उम्मीद है कितनी भी आधुनिकता हो जाए हमारी यह विरासत बनी परंपरा जारी रहेगी

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